Prithviraj Chauhan की कहानी | New Movie Real Story | Biography [2020]

Prithviraj Chauhan की कहानी | New Movie Real Story | Biography [2020]

200 भारत देश का इतिहास जितना गहरा है उसमें उतने ही ज्यादा वीर योद्धा भी शामिल हैं। अब चाहे आप बात करें रानी लक्ष्मीबाई की महाराणा प्रताप की या फिर राष्ट्रपति शिवाजी महाराज की तरह ही और भी हजारों लोगों की। हालांकि देश के अंदर समय समय पर बहुत सारे ऐसे लोगों ने वीरता का प्रमाण दिया है कि सिर्फ़ एक वीडियो में उनका नाम लेना पॉसिबल नहीं है लेकिन इन सभी वीरों को लायबिलिटी चैनल नमन करता है।

और विश्वास के इस वीडियो में भी हमें एक ऐसे ही योद्धा के बारे में बात करने वाले हैं जिनका लोहा पूरी दुनिया मानती है। जी हां मैं बात कर रहा हूं भारत के वीर पृथ्वीराज चौहान की जिन्होंने अपने आपको कुछ इस तरह से तैयार किया था कि सिर्फ़ आवाज़ सुनकर ही बिना देखे हुए वह दुश्मनों पर निशाना साध सकते थे। साथी पृथ्वीराज चौहान ही थे जिन्होंने मोहम्मद गौरी जैसे खूंखार और खतरनाक दुश्मन को न केवल एक दो बार बल्कि लगातार 17 बार हराया। साथी मुगल शासन से पहले। दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले अंतिम हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान भी थे और दोस्तो इस महान योद्धा के ऊपर ही बॉलीवुड में भी एक मूवी बनाई जा रही है जिसका नाम है राज। और इस मूवी में अक्षय कुमार लीड रोल में दिखाई पड़ रहे हैं। हालांकि चलिए आज की इस विडियो में हम जानते हैं कि आखिर क्या कि पृथ्वीराज चौहान की महानता इसकी वजह से सैकड़ों साल बाद भी उन्हें याद किया जाता है।

दरअसल इस कहानी की शुरुआत होती है 11 सौ जाट से जब पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर में राजा सोमेश्वर चौहान के घर पर हुआ था।

साथ ही पृथ्वीराज की मां का नाम था कर पुरा देवी और 200 पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही घुड़सवारी और तलवारबाजी जैसे खेलों के शौकीन थे लेकिन उनकी जो सबसे खास विशेषता थी वो ही शब्दभेदी बाण चलाना। दरअसल इसका मतलब है कि आंख बंद होने के बावजूद सिर्फ आवाज को सुनकर ही वह बिल्कुल सटीक निशाना लगा लेते थे और इन सभी विशेषताओं का पता जब पृथ्वीराज के नाना और उस समय दिल्ली के राजा आनंदपाल को लगी तब उन्होंने पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का राजा बनाने का निर्णय ले लिया और फिर इसी कड़ी में ही सिर्फ 16 साल की उम्र में पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली की राजगद्दी संभाल ली और फिर राजा बनने के बाद उन्होंने किले का निर्माण करवाया जिसका नाम था पिथौरागढ़।

हालांकि पृथ्वीराज चौहान का बचपन चूंकि अजमेर में गुजरा था इसलिए दिल्ली का राजा बनने के बाद भी उनका मन अजमेर में ही अटका हुआ था। और फिर इसी वजह से आगे चलकर उन्होंने दोनों नगरों को राजधानी बना दिया। साथ ही पृथ्वीराज चौहान ने लगातार कई सारे विजय अभियान चलाकर अपने राज्य की सीमाओं को गुजरात और पूर्वी पंजाब तक बढ़ा कर और भी बड़ा कर लिया था।

हालांकि इतनी ज्यादा तरक्की को देखते हुए काफी सारे राजाओं के मन में उनके लिए जलन की भावना भी पैदा होने लगी और उन्हीं राजाओं में से एक थे जयचंद जिनकी राजधानी थी कन्नौज। हालांकि एक तरफ जहां जयचंद पृथ्वीराज चौहान की प्रसिद्धि से जलते थे वहीं उनकी लड़की संयोगिता पृथ्वीराज चौहान के साहस और वीरता से प्रभावित थी। और वह पृथ्वीराज को अपना दिल दे बैठी थी। हालांकि जब इस बात की खबर राजा जयचंद को मालूम हुई तब वह गुस्से से आगबबूला हो गए और फिर गुस्से में ही उन्होंने निर्णय लिया कि बेटी की शादी वह जल्द से जल्द कर देंगे और इसी के साथ ही उन्होंने पृथ्वीराज चौहान को अपमानित करने का भी प्लान बना लिया और फिर कुछ इसी तरह से जयचंद ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया। इसमें की संयोगिता अपने पसंद के वर को चुन सकती थी।

हालांकि राजा जयचंद ने सभी छोटे बड़े राजाओं को निमंत्रण दिया लेकिन पृथ्वीराज चौहान को उन्होंने छोड़ दिया था और फिर पृथ्वीराज का मजाक बनाने के लिए जयचंद ने उनकी मूर्ति बनाई और द्वारपाल बनाकर शादी मंडप के गेट पर खड़ा कर दिया।

हालांकि जब इस बात की खबर जयचंद की बेटी को पता लगी तब वह बहुत ही दुखी हो गई। हालांकि वर चुनते समय उन्होंने किसी के गले में माला न डालकर पृथ्वीराज चौहान की मूर्ति को पहना दिया और फिर यह सब कुछ देखकर विवाह के लिए आए सभी राजा हक्के बक्के रह गए थे लेकिन दोस्तो असल कहानी तो तब शुरू होती है जब मूर्ति के पीछे से सच में पृथ्वीराज चौहान निकले और पिहोवा संयोगिता को अपने घोड़े पर बैठाकर वापस आ गया। हालांकि दोस्तो इसी दौरान अफगानिस्तान का शासक मोहम्मद गोरी भारत की तरफ़ बढ़ रहा था। और उसने पश्चिम पंजाब तक अपना शासन भी स्थापित कर लिया था।

और फिर पृथ्वीराज चौहान की सीमा भटिंडा के किले पर भी उसने हमला बोल दिया। हालांकि जैसे ही इस बात की खबर राजा को लगी तब वैसे ही वह अपनी सेना को लेकर भटिंडा पहुंच गए और उसको एक ओर जहां मोहम्मद गौरी की सेना जीत के नशे में चूर थी वहीं पृथ्वीराज चौहान की सेना देशभक्ति में भरी हुई थी और फिर पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच हुए युद्ध में मुहम्मद गौरी को मुंह की खानी पड़ी। हालांकि इस युद्ध के बाद भी मुहम्मद गौरी ने लगातार 16 बार आक्रमण किया लेकिन हर बार ही उसे हार का मुंह देखना पड़ता था। लेकिन उसको जब इस बात की खबर पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता के पिता।

यानि की जयचंदों को मालूम पड़ी तब अपना बदला लेने के लिए इस मौके को उन्होंने बिल्कुल सही समझा और फिर इसी कड़ी में ही जयचंद मुहम्मद गौरी के साथ मिल गया और फिर दो साल के बाद से 11 सौ 92 में मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को एक बार फिर से युद्ध के लिए ललकारा और इधर मोहम्मद गौरी के पास एक लाख 20 हजार सैनिकों की विशाल सेना थी। हालांकि इसके बावजूद भी पृथ्वीराज चौहान ने उसे पिछली हारों को याद दिलाते हुए वापस लौट जाने की बात कही और फिर मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को धोखा देने के लिए अपनी सेना भी थोड़ी पीछे ले ली और इसी वजह से पृथ्वीराज चौहान को यह लगा कि मोहम्मद गौरी उनकी बात को मान गया है। हालांकि मोहम्मद गौरी तो सही समय का इंतजार कर रहा था। क्योंकि एक दिन बिल्कुल सुबह जब पृथ्वीराज चौहान के सभी सैनिक पूजा पाठ में बिजी थे तब मोहम्मद गौरी ने उन पर हमला कर दिया।

और फिर पृथ्वीराज चौहान को चारों तरफ से घेर कर उन्हें और उनके प्रिय मित्र चंद्र सरदार को बंदी बना लिया गया। हालांकि बंदी बनाए जाने के बाद से जब पृथ्वीराज को मोहम्मद गौरी के सामने दरबार में पेश किया गया तब पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को चेतावनी देते हुए यह कहा कि तुम मुझे मार दो नहीं तो आगे चलकर तुम्हें पछताना पड़ेगा। लेकिन दोस्तो लगातार 17 बार हारा हुआ मोहम्मद गौरी तो पृथ्वीराज चौहान को घुट घुटकर मरना देखना पसंद करता था और इसीलिए उसने पृथ्वीराज चौहान को अभी न मारने की बात कही। हालांकि दरबार में पृथ्वीराज चौहान सीना तानकर खड़े थे और यह देखकर मोहम्मद गौरी ने कहा कि तुम राजा के दरबार में खड़े हो अपनी नजरों को नीचे रखो हालांकि इसका जवाब भी पृथ्वीराज चौहान ने ऐसा दिया कि सभी के रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने कहा।

कि एक सच्चे राजपूत की नजरें केवल मौत ही झुका सकती हैं और फिर इस बात को सुनकर मोहम्मद गौरी ने गुस्से में आकर पृथ्वीराज चौहान के आंखों को फोड़ने का आदेश दे दिया और फिर आखिरकार उन्हें अंधा करके जेल में डाल दिया गया लेकिन उसको पृथ्वीराज चौहान के प्रिय मित्र चिंदबरम आईफोन का यह दर्द देखा नहीं गया और फिर उन्होंने मुहम्मद गौरी को सबक सिखाने की ठान लिया और दोस्तो इसी कड़ी में ही चंदर दाई ने मुहम्मद गौरी के दरबार में हाजिर होने की इच्छा जताई। दरअसल उन्होंने बताया कि पृथ्वीराज बिना देखे हुए ही लक्ष्य पर सटीक निशाना लगा सकते हैं पर अगर भरोसा ना हो तो राजा के सामने वो अपने प्रिय मित्र से ऐसा करतब दिखाने को कहेंगे।

और दोस्तो इस बात का पता लगने के बाद से मोहम्मद गौरी ने फिर से चंदाबाई और पृथ्वीराज चौहान को अपने दरबार में बुलाया और इस बार पृथ्वीराज चौहान को तीर और धनुष देकर दरबार के ही किसी आदमी ने अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए कहा लेकिन उसने पृथ्वीराज चौहान ने यह उत्तर दिया कि मैं राजा हूं और इसी वजह से मैं केवल सुल्तान यानि की मोहम्मद गौरी के हुकुम का ही पालन करूंगा और यह बात सुनकर मानो मुहम्मद गौरी खुशी से झूम उठा था और अपने मुंह से बोलते हुए पृथ्वीराज चौहान को उसने निशाना लगाने का आदेश दिया और दोस्तों जैसा कि आप सभी को मैंने पहले ही बताया था कि पृथ्वीराज चौहान के अंदर ऐसी काबिलियत थी।

कि सिर्फ़ आवाज सुनकर ही वह सटीक निशाना लगा सकते थे और इसी तरह से उन्होंने मोहम्मद गौरी की आवाज सुनते ही अपनी बाँह की दिशा बदली और मोहम्मद गौरी को भेज दिया था जिससे कि मुहम्मद गौरी की उसी समय ही मृत्यु हो गई। हालांकि अब पृथ्वीराज चौहान और उनके मित्र चंद्र सरदार यह जानते थे कि उनकी जान को नहीं बख्शा जाएगा और इसीलिए अपने दुश्मनों से हारने की बजाय उन्होंने एक दूसरे को छुरा मारकर हत्या कर दी और फिर जब पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु की खबर उनकी पत्नी संयोगिता ने सुनी तब उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए। हालांकि इस महान योद्धा को आज भी लोग याद करते हैं और जब कभी भी साहसी लोगों को याद किया जाता है। तो उस समय इस राजपूत का नाम हमारे मन में सबसे पहले आता है और डरकर पृथ्वीराज चौहान के ऊपर ही बॉलीवुड में एक मूवी बन रही है।

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